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कुम्भ दर्शन

आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं संस्कृतियों के मिलन का पर्व है “कुम्भ”। ज्ञान, चेतना और उसका परस्पर मंथन कुम्भ मेले का वो आयाम है जो आदि काल से ही हिन्दू धर्मावलम्बियों की जागृत चेतना को बिना किसी आमन्त्रण के खींच कर ले आता है। कुम्भ पर्व किसी इतिहास निर्माण के दृष्टिकोण से नहीं शुरू हुआ था अपितु इसका इतिहास समय द्वारा स्वयं ही बना दिया गया। वैसे भी धार्मिक परम्पराएं हमेशा आस्था एवं विश्वास के आधार पर टिकती हैं न कि इतिहास पर। यह कहा जा सकता है कि कुम्भ जैसा विशालतम् मेला संस्कृतियों को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए ही आयोजित होता है।

"आस्था, विश्वास, सौहार्द
एवं
मिलनसारिता का पर्व है कुम्भ"

कुम्भ का शाब्दिक अर्थ है कलश और यहाँ ‘कलश’ का सम्बन्ध अमृत कलश से है। बात उस समय की है जब देवासुर संग्राम के बाद दोनों पक्ष समुद्र मंथन को राजी हुए थे। मथना था समुद्र तो मथनी और नेति भी उसी हिसाब की चाहिए थी। ऐसे में मंदराचल पर्वत मथनी बना और नाग वासुकी उसकी नेति। मंथन से चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई जिन्हें परस्पर बाँट लिया गया परन्तु जब धन्वन्तरि ने अमृत कलश देवताओं को दे दिया तो फिर युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। तब भगवान् विष्णु ने स्वयं मोहिनी रूप धारण कर सबको अमृत-पान कराने की बात कही और अमृत कलश का दायित्व इंद्र-पुत्र जयंत को सौपा। अमृत-कलश को प्राप्त कर जब जयंत दानवों से अमृत की रक्षा हेतु भाग रहा था तभी इसी क्रम में अमृत की बूंदे पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरी- हरिद्वार, नासिक, उजैन और प्रयागराज। चूँकि विष्णु की आज्ञा से सूर्य, चन्द्र, शनि एवं बृहस्पति भी अमृत कलश की रक्षा कर रहे थे और विभिन्न राशियों (सिंह, कुम्भ एवं मेष) में विचरण के कारण ये सभी कुम्भ पर्व के द्योतक बन गये। इस प्रकार ग्रहों एवं राशियों की सहभागिता के कारण कुम्भ पर्व ज्योतिष का पर्व भी बन गया। जयंत को अमृत कलश को स्वर्ग ले जाने में 12 दिन का समय लगा था और माना जाता है कि देवताओं का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर होता है। यही कारण है कि कालान्तर में वर्णित स्थानों पर ही ग्रह-राशियों के विशेष संयोग पर 12 वर्षों में कुम्भ मेले का आयोजन होता है।

असतो मा सदगमय ॥
तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥
मृत्योर्मामृतम् गमय ॥

ज्योतिष गणना के क्रम में कुम्भ का आयोजन चार प्रकार से माना गया है
बृहस्पति के कुम्भ राशि में तथा सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर हरिद्वार में गंगा-तट पर कुम्भ पर्व का आयोजन होता है। बृहस्पति के मेष राशि चक्र में प्रविष्ट होने तथा सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में आने पर अमावस्या के दिन प्रयागराज में त्रिवेणी संगम तट पर कुम्भ पर्व का आयोजन होता है। बृहस्पति एवं सूर्य के सिंह राशि में प्रविष्ट होने पर नासिक में गोदावरी तट पर कुम्भ पर्व का आयोजन होता है। बृहस्पति के सिंह राशि में तथा सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर उज्जैन में शिप्रा तट पर कुम्भ पर्व का आयोजन होता है।
धार्मिकता एवं ग्रह-दशा के साथ-साथ कुम्भ पर्व को पुनः तत्वमीमांसा की कसौटी पर भी कसा जा सकता है, जिससे कुम्भ की उपयोगिता सिद्ध होती है। कुम्भ पर्व का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि यह पर्व प्रकृति एवं जीव तत्व में सामंजस्य स्थापित कर उनमें जीवनदायी शक्तियों को समाविष्ट करता है। प्रकृति ही जीवन एवं मृत्यु का आधार है, ऐसे में प्रकृति से सामंजस्य अति-आवश्यक हो जाता है। कहा भी गया है "यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे" अर्थात जो शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में है, इस लिए ब्रह्माण्ड की शक्तियों के साथ पिण्ड (शरीर) कैसे सामंजस्य स्थापित करे, उसे जीवनदायी शक्तियाँ कैसे मिले इसी रहस्य का पर्व है कुम्भ। विभिन्न मतों-अभिमतों-मतान्तरों के व्यवहारिक मंथन का पर्व है कुम्भ, और इस मंथन से निकलने वाला ज्ञान-अमृत ही कुम्भ-पर्व का प्रसाद है।

आध्यात्मिक महत्व

परम्परा कुंभ मेला के मूल को 8वी शताब्दी के महान दार्शनिक शंकर से जोड़ती है, जिन्होंने वाद विवाद एवं विवेचना हेतु विद्वान सन्यासीगण की नियमित सभा संस्थित की। कुंभ मेला की आधारभूत किवदंती पुराणों (किंबदंती एवं श्रुत का संग्रह) को अनुयोजित है-यह स्मरण कराती है कि कैसे अमृत (अमरत्व का रस) का पवित्र कुंभ (कलश) पर सुर एवं असुरों में संघर्ष हुआ जिसे समुद्र मंथन के अंतिम रत्न के रूप में प्रस्तुत किया गया था। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत जब्त कर लिया एवं असुरों से बचाव कर भागते समय भगवान विष्णु ने अमृत अपने वाहन गरूण को दे दिया, जारी संघर्ष में अमृत की कुछ बूंदे हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयाग में गिरी। सम्बन्धित नदियों के प्रत्येक भूस्थैतिक गतिशीलता पर उस महत्वपूर्ण अमृत में बदल जाने का विश्वास किया जाता है जिससे तीर्थयात्रीगण को पवित्रता, मांगलिकता और अमरत्व के भाव में स्नान करने का एक अवसर प्राप्त होता है। शब्द कुंभ पवित्र अमृत कलश से व्युत्पन्न हुआ है।

प्रयागराज में कुम्भ
हिन्दू धर्मावलम्बी तीर्थयात्रीगण के बीच कुंभ एक सर्वाधिक पवित्र पर्व है। करोड़ों महिलायें, पुरूष, आध्यात्मिक साधकगण और पर्यटक आस्था एवं विश्वास की दृष्टि से शामिल होते हैं। यह विद्वानों के लिये शोध का विषय है कि कब कुंभ के बारे में जनश्रुति आरम्भ हुई थी और इसने तीर्थयात्रीगण को आकर्षित करना आरम्भ किया किन्तु यह एक स्थापित सत्य है कि प्रयाग कुंभ का केन्द्र बिन्दु रहा है और ऐसे विस्तृत पटल पर एक घटना एक दिन में घटित नहीं होती है बल्कि धीरे-धीरे एक कालावधि में विकसित होती है। ऐतिहासिक साक्ष्य कालनिर्धारण के रूप में राजा हर्षवर्धन का शासन काल (664 ईसा पूर्व) के प्रति संकेतन करते हैं जब कुंभ मेला को विभिन्न भौगोलिक स्थितियों के मध्य व्यापक मान्यता प्राप्त हो गयी थी। प्रसिद्व यात्री हवेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तांत में कुंभ मेला की महानता का उल्लेख किया है। यात्री का उल्लेख राजा हर्षवर्धन की दानवीरता का सार संक्षेपण भी करती है।

राजा हर्ष रेत पर एक महान पंचवर्षीय सम्मेलन का आयोजन करते थे, जहां पवित्र नदियों का संगम होता है और अपनी सम्पत्ति कोष को सभी वर्गो के गरीब एवं धार्मिक लोगों में बाँट देते थे। इस व्यवहार का अनुसरण उनके पूर्वजों के द्वारा किया जाता था।

प्रयागराज में कुम्भ
प्रयागराज में कुम्भ मेला को ज्ञान एवं प्रकाश के श्रोत के रूप में सभी कुम्भ पर्वो में व्यापक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। सूर्य जो ज्ञान का प्रतीक है, इस त्योहार में उदित होता है। शास्त्रीय रूप से ब्रह्मा जी ने पवित्रतम नदी गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर दशाश्वमेघ घाट पर अश्वमेघ यज्ञ किया था और सृष्टि का सृजन किया था।

कुम्भ का तात्विक अर्थ
कुम्भ सृष्टि में सभी संस्कृतियों का संगम है। कुम्भ आध्यत्मिक चेतना है। कुम्भ मानवता का प्रवाह है। कुम्भ नदियां, वनों एवं ऋषि संस्कृति का प्रवाह है। कुम्भ जीवन की गतिशीलता है। कुम्भ प्रकृति एवं मानव जीवन का संयोजन है। कुम्भ ऊर्जा का श्रोत है। कुम्भ आत्मप्रकाश का मार्ग है।

कुम्भपर्व का मूलाधार पौराणिक आख्यानों से साथ-साथ खगोल विज्ञान ही है क्योंकि ग्रहों की विशेष स्थितियाँ ही कुम्भपर्व के काल का निर्धारण करती है। कुम्भपर्व एक ऐसा पर्वविशेष है जिसमें तिथि, ग्रह, मास आदि का अत्यन्त पवित्र योग होता है। कुम्भपर्व का योग सूर्य, चंद्रमा, गुरू और शनि के सम्बध में सुनिश्चित होता है। स्कन्द पुराण में लिखा गया है कि -

चन्द्रः प्रश्रवणाद्रक्षां सूर्यो विस्फोटनाद्दधौ।
दैत्येभ्यश्र गुरू रक्षां सौरिर्देवेन्द्रजाद् भयात्।।
सूर्येन्दुगुरूसंयोगस्य यद्राशौ यत्र वत्सरे।
सुधाकुम्भप्लवे भूमे कुम्भो भवति नान्यथा।।

ज्योतिषीय महत्व
अर्थात् जिस समय अमृतपूर्ण कुम्भ को लेकर देवताओं एवं दैत्यों में संघर्ष हुआ उस समय चंद्रमा ने उस अमृतकुम्भ से अमृत के छलकने से रक्षा की और सूर्य ने उस अमृत कुम्भ के टूटने से रक्षा की। देवगुरू बृहस्पति ने दैत्यों से तथा शनि ने इंद्रपुत्र जयन्त से रक्षा की। इसी लिए उस देव दैत्य कलह में जिन-जिन स्थानों में (हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन, नासिक) जिस-जिस दिन सुधा कुम्भ छलका है उन्हीं-उन्हीं स्थलों में उन्हीं तिथियों में कुम्भपर्व होता है। इन देव दैत्यों का युद्ध सुधा कुम्भ को लेकर 12 दिन तक 12 स्थानों में चला और उन 12 स्थलों में सुधा कुम्भ से अमृत छलका जिनमें पूर्वोक्त चार स्थल मृत्युलोक में है शेष आठ इस मृत्युलोक में न होकर अन्य लोकों में (स्वर्ग आदि लोकों में) माने जाते हैं। 12 वर्ष के मान का देवताओं का बारह दिन होता है। इसीलिए 12वें वर्ष ही सामान्यतया प्रत्येक स्थान में कुम्भपर्व की स्थिति बनती है।

वृष राशि में गुरू मकर राशि में सूर्य तथा चंद्रमा माघ मास में अमावस्या के दिन कुम्भपर्व की स्थिति देखी गयी है। इसलिए प्रयाग के कुम्भपर्व के विषय में- "वृषराषिगतेजीवे" के समान ही "मेषराशिगतेजीवे" ऐसा उल्लेख मिलता है।

कुम्भपर्वों का जो ग्रह योग प्राप्त होता है वह लगभग सभी जगह सामान्य रूप से बारहवे वर्ष प्राप्त होता है। परन्तु कभी-कभी ग्यारहवें वर्ष भी कुम्भपर्व की स्थिति देखी जाती है। यह विषय अत्यन्त विचारणीय हैं, सामान्यतया सूर्य चंद्र की स्थिति को प्रतिवर्ष चारों स्थलों में स्वतः बनती है। उसके लिए प्रयाग में कुम्भपर्व के समय वृष के गुरू रहते हैं जिनका स्वामी शुक्र है। शुक्रग्रह ऐश्वर्य भोग एवं स्नेह का सम्वर्धक है। गुरू ग्रह के इस राशि में स्थित होने से मानव के वैचारिक भावों में परम सात्विकता का संचार होता है जिससे स्नेह, भोग एवं ऐश्वर्य की सम्प्राप्ति के विचार में जो सात्विकता प्रवाहित होती है उससे उनके रजोगुणी दोष स्वतः विलीन होते हैं। तथैव मकर राशिगत सूर्य समस्त क्रियाओं में पटुता एवमेव मकर राशिस्थ चंद्र परम ऐश्वर्य को प्राप्त कराता है। फलतः ज्ञान एवं भक्ति की धारा स्वरूप गंगा एवं यमुना के इस पवित्र संगम क्षेत्र में चारो पुरूषार्थों की सिद्धि अल्पप्रयास में ही श्रद्धालु मानव के समीपस्थ दिखाई देती है।

प्रत्येक ग्रह अपने-अपने राशि को एक सुनिश्चित समय में भोगता है जैसे सूर्य एक राशि को 30 दिन 26 घडी 17 पल 5 विपल का समय लेता है एवं चंद्रमा एक राशि का भाग लगभग 2.5 दिन में पूरा करता है तथैव बृहस्पति एक राशि का भोग 361 दिन 1 घडी 36 पल में करता है। स्थूल गणना के आधार पर वर्ष भर का काल बृहस्पति का मान लिया जाता है। किन्तु सौरवर्ष के अनुसार एक वर्ष में चार दिन 13 घडी एवं 55 पल का अन्तर बार्हस्पत्य वर्ष से होता है जो 12 वर्ष में 50 दिन 47 घडी का अन्तर पड़ता है और यही 84 वर्षों में 355 दिन 29 घडी का अन्तर बन जाता है। इसीलिए 50वें वर्ष जब कुम्भपर्व आता है तब वह 11वें वर्ष ही पड़ जाता है।

सामाजिक महत्व

किसी उत्सव के आयोजन में भारी जनसम्पर्क अभियान, प्रोन्नयन गतिविधियां और अतिथियों को आमंत्रण प्रेषित किये जाने की आवश्यकता होती है, जबकि कुंभ विश्व में एक ऐसा पर्व है जहाँ कोई आमंत्रण अपेक्षित नहीं होता है तथापि करोड़ों तीर्थयात्री इस पवित्र पर्व को मनाने के लिये एकत्र होते हैं।

प्राथमिक स्नान कर्म के अतिरिक्त पर्व का सामाजिक पक्ष विभिन्न यज्ञों, वेद मंत्रों का उच्चारण, प्रवचन, नृत्य, भक्ति भाव के गीतों, आध्यात्मिक कथानकों पर आधारित कार्यक्रमों, प्रार्थनाओं, धार्मिक सभाओं के चारो ओर धूमती हैं, जहाँ सिद्धांतों पर वाद-विवाद एवं विमर्श प्रसिद्ध संतों एवं साधुओं के द्वारा किया जाता है और मानकस्वरूप प्रदान किया जाता है। पर्व का एक महत्वपूर्ण भाग गरीबों एवं वंचितों को अन्न एवं वस्त्र का दान कर्म है और संतों को आध्यात्मिक भाव के साथ गाय एवं स्वर्ण दान किया जाता है।

मानव मात्र का कल्याण, सम्पूर्ण विश्व में सभी मानव प्रजाति के मध्य वसुधैव कुटुम्बकम के रूप में अच्छा सम्बन्ध बनाये रखने के साथ आदर्श विचारों एवं गूढ़ ज्ञान का आदान प्रदान कुंभ का मूल तत्व और संदेश है जो कुंभ पर्व के दौरान प्रचलित है। कुंभ भारत और विश्व के जन सामान्य को अविस्मरणीय काल तक आध्यात्मिक रूप से एकताबद्ध करता रहा है और भविष्य में ऐसा किया जाना जारी रहेगा।

कुम्भ का सामाजिक दृष्टिकोण

कुम्भ के कर्मकांड

आरती
स्नान
कल्पवास
दीपदान
त्रिवेणी संगम
प्रयागराज पंचकोसी परिक्रमा
श्री माधव मंदिर

आरती
भारतवर्ष में प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों यथा नदी, पर्वत ,वृक्ष आदि को देव-स्वरुप मान कर उनकी आराधना करने का प्रचलन आदिकाल से चला आ रहा है। इसी क्रम में जीवनदायिनी निरंतर प्रवाहयुक्त नदियों को प्रमुखता प्रदान की गई है। सरल शब्दों में जीवनदायिनी के प्रति मानव कृतज्ञ होकर अपने भावों की अभिव्यक्ति उनके तट पर आरती के माध्यम से करता आ रहा है, जिसमे विशाल जनसमूह श्रद्धाभाव से सम्मिलित होता है। कहीं यह संख्या सैकड़ों में होती है तो कहीं हज़ारों में तो कहीं कभी-कभी लाखों तक पहुँच जाती है। इसी प्रकार श्रद्धाभाव, आदर एवं सम्मान से ओत-प्रोत आरतियाँ तीर्थराज प्रयाग में गंगा एवं यमुना के तटों के साथ- साथ संगम स्थल पर भी आयोजित होती हैं।

यहाँ प्रयागराज मेला प्राधिकरण एवं विभिन्न समितियों द्वारा बड़े धूम-धाम से आरतियाँ कराई जाती हैं जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। विशेष पर्वों पर तो यह संख्या लाखों के पार भी हो जाती है। प्रयागराज में यह आरतियाँ प्रातः एवं संध्याकाल में होती हैं। जिसमें पाँच से सात की संख्या में बटुक (पुजारी) बड़ी-बड़ी थालों में माँ स्वरूपिणी गंगा जी एवं यमुना जी एवं अदृश्य सरस्वती की आराधना बड़े ही भक्ति-भाव से करते हैं। बटुकों के हांथो में आरती की थालियाँ जैसे साक्षात् पंचतत्वों के महत्त्व को समझाती दिखती हैं। एक ओर ज्वाला जल के चरणों में शीश नवाती हैं तो दूसरी ओर उससे उठता धूम धरा पर व्योम का स्वांग रचता प्रतीत होता है। सुदूर किसी पुल के ऊपर खड़ा मानुस इस विहंगम दृश्य की एकमात्र झलक अपने मस्तिष्क में बिठा लेना चाहता है, आरती के अलौकिक व दैवीय प्रभाव को आत्मसात कर लेना चाहता है।

आध्यात्मिक गुरूजन

अखाड़ा
अखाड़ा शब्द को सुनते ही जो दृश्य मानस पटल पर उतरता है वह मल्लयुद्ध का है। किन्तु यहाँ भाव शब्द की अन्वति और वास्तविक अर्थ से संबोधित है। "अखाड़ा" शब्द "अखण्ड" शब्द का अपभ्रंश है जिसका अर्थ न विभाजित होने वाला है। आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा हेतु साधुओं के संघों को मिलाने का प्रयास किया था, उसी प्रयास के फलस्वरूप सनातन धर्म की रक्षा एवं मजबूती बनाये रखने एवं विभिन्न परम्पराओं व विश्वासों का अभ्यास करने वालों को एकजुट करने तथा धार्मिक परम्पराओं को अक्षुण्ण रखने के लिए विभिन्न अखाड़ों की स्थापना हुई। अखाड़ों से सम्बन्धित साधु-सन्तों की विशेषता यह होती है कि इनके सदस्य शास्त्र और शस्त्र दोनों में पारंगत होते हैं।

अखाड़ा सामाजिक व्यवस्था, एकता और संस्कृति तथा नैतिकता का प्रतीक है। समाज में आध्यात्मिक महत्व मूल्यों की स्थापना करना ही अखाड़ों का मुख्य उद्देश्य है। अखाड़ा मठों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना करना है, इसीलिए धर्म गुरुओं के चयन के समय यह ध्यान रखा जाता था कि उनका जीवन सदाचार, संयम, परोपकार, कर्मठता, दूरदर्शिता तथा धर्ममय हो। भारतीय संस्कृति एवं एकता इन्हीं अखाड़ों के बल पर जीवित है। अलग-अलग संगठनों में विभक्त होते हुए भी अखाडे़ एकता के प्रतीक हैं। अखाड़ा मठों का एक विशिष्ट प्रकार नागा संन्यासियों का एक विशेष संगठन है। प्रत्येक नागा संन्यासी किसी न किसी अखाड़े से सम्बन्धित रहते हैं। ये संन्यासी जहाँ एक ओर शास्त्र पारांगत थे वहीं दूसरी ओर शस्त्र चलाने का भी इन्हें अनुभव था।

वर्तमान में अखाड़ों को उनके इष्ट-देव के आधार पर निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

शैव अखाड़े इस श्रेणी के इष्ट भगवान शिव हैं। ये शिव के विभिन्न स्वरूपों की आराधना अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर करते हैं।वैष्णव अखाड़े इस श्रेणी के इष्ट भगवान विष्णु हैं। ये विष्णु के विभिन्न स्वरूपों की आराधना अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर करते हैं। उदासीन अखाड़ा सिक्ख सम्प्रदाय के आदि गुरु श्री नानकदेव के पुत्र श्री चंद्रदेव जी को उदासीन मत का प्रवर्तक माना जाता है। इस पन्थ के अनुयाई मुख्यतः प्रणव अथवा ‘ॐ’ की उपासना करते हैं।
अखाड़ों की व्यवस्था एवं संचालन हेतु पाँच लोगों की एक समिति होती है जो ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश व शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है । अखाड़ों में संख्या के हिसाब से सबसे बड़ा जूना अखाड़ा है इसके बाद निरञ्जनी और तत्पश्चात् महानिर्वाणी अखाड़ा है । उनके अध्यक्ष श्री महंत तथा अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामण्डेलेश्वर के रुप में माने जाते हैं। महामण्डलेश्वर ही अखाड़े में आने वाले साधुओं को गुरु मन्त्र भी देते हैं। पेशवाई या शाही स्नान के समय में निकलने वाले जुलूस में आचार्य महामण्डलेश्वर और श्रीमहंत रथों पर आरूढ़ होते हैं, उनके सचिव हाथी पर, घुड़सवार नागा अपने घोड़ों पर तथा अन्य साधु पैदल आगे रहते हैं। शाही ठाट-बाट के साथ अपनी कला प्रदर्शन करते हुए साधु-सन्त अपने लाव-लश्कर के साथ अपने-अपने गन्तव्य को पहुँचते हैं।

अखाड़ों में आपसी सामंजस्य बनाने एवं आंतरिक विवादों को सुलझाने के लिए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् का गठन किया गया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् ही आपस में परामर्श कर पेशवाई के जुलूस और शाही स्नान के लिए तिथियों और समय का निर्धारण मेला आयोजन समिति, आयुक्त, जिलाधिकारी, मेलाधिकारी के साथ मिलकर करता है।

आज इन अखाड़ों को बहुत ही श्रद्धा-भाव से देखा जाता है। सनातन धर्म की पताका हाथ में लिए यह अखाड़े धर्म का आलोक चहुँओर फैला रहे हैं। इनके प्रति आम जन-मानस में श्रद्धा का भाव शाही स्नान के अवसर पर देखा जा सकता है, जब वे जुलूस मार्ग के दोनों ओर इनके दर्शनार्थ एकत्र होते हैं तथा अत्यंत श्रद्धा से इनकी चरण-रज लेने का प्रयास करते हैं।

दण्डी बाड़ा
हाथ में दण्ड जिसे ब्रम्ह दण्ड कहते है, धारण करने वाले संन्यासी को दण्डी संन्यासी कहा जाता है। दण्डी संन्यासियों का संगठन दण्डी बाड़ा के नाम से जाना जाता है। “दण्ड संन्यास” सम्प्रदाय नहीं अपितु आश्रम परम्परा है। दण्ड संन्यास परम्परा के अन्तर्गत दण्ड संन्यास लेने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण को है। प्रथम दण्डी संन्यासी के रुप में भगवान नारायण ने ही दण्ड धारण किया है।

"नारायणं पद्य भवं वशिष्ठं, शक्तिं च तत्पुत्र पाराशरं च
व्यासं शुकं गौड़ पदं महन्तं गोविन्द योगिन्द्रमथास्य शिष्यं
श्री शंकराचार्यमथास्य पद्य पादं ए हस्तामलकं च शिष्यं
तं त्रोटकं वार्तिककार मनमानस्य गुरु सततं मानतोऽस्मि।।"

तत्पश्चात् भगवान आदि गुरु शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की और इन चारों मठों में धर्माचार्यों की नियुक्ति की। तदुपरान्त धर्म की रक्षा के लिए भगवान आदि शंकराचार्य ने दशनाम संन्यास की स्थापना की, जिनमें तीन (आश्रम, तीर्थ, सरस्वती) दण्डी संन्यासी हुए और सात अखाड़ों के रुप में स्थापित हुए। उपर्युक्त तीन नामों में सर्वप्रथम आश्रम आता है। इनका प्रधान मठ शारदा मठ है, इनके देवता सिद्धेश्वर और देवी भद्रकाली होती हैं तथा इनके आचार्य विश्वरुपाचार्य हैं। इनके ब्रम्हचारी की उपाधि 'स्वरुप' है। इन्हीं में दूसरा नाम तीर्थ आता है जो आश्रम के ही समस्त आचरण को अपनाते हैं। तीसरा नाम सरस्वती है, जो शृंगेरी मठ के अनुयायी होते हैं।

आचार्य बाड़ा
आचार्य बाड़ा सम्प्रदाय ही रामानुज सम्प्रदाय नाम से भी जाना जाता है। इस सम्प्रदाय के पहले आचार्य शठकोप हुए जो सूप बेचा करते थे। "शूर्पं विक्रीय विचार शठकोप योगी"। उनके शिष्य मुनिवाहन हुए। तीसरे आचार्य यामनाचार्य हुए। चौथे आचार्य रामानुज हुए। उन्होंने कई ग्रन्थ बनाकर अपने सम्प्रदाय का प्रचार किया। तभी से इस सम्प्रदाय का नाम श्री रामानुज सम्प्रदाय हो गया। इस सम्प्रदाय के अनुयायी नारायण की आराधना करते है और लक्ष्मी को अपनी देवी मानते हैं। कावेरी नदी पर ये अपना तीर्थ मानते हैं और त्रिदंड धारण करते हैं।

आचार्य बाड़ा संप्रदाय में ब्रह्मचारी दीक्षा आठ वर्ष से अधिक आयु के बालकों को दी जाती। इसके बाद उन्हें वेद अध्ययन कराया जाता है। सामवेद को ये अपना वेद मानते हैं । आराधना के कई चरणों की परीक्षा के बाद ही उन्हें संन्यास दिया जाता है। उन्हें इस बात की स्वतंत्रता है कि पढ़ाई पूरी होने पर वे चाहे तो गृहस्थ हो सकते हैं परन्तु संन्यासी होने के बाद परिवार से नाता छूट जाता है।

संन्यासियों को पंच संस्कार की दीक्षा दी जाती है- 1. जिनमें शंख चक्र गरम करके हाथ के मूल में स्पर्श कराया जाता है, 2. माथे पर चंदन का त्रिपुंड टीका धारण कराया जाता है 3, सन्तों का भगवान के नाम पर नामकरण किया जाता है 4. तत्पश्चात उन्हें गुरु मंत्र दिया जाता है, एवं 5. यज्ञ संस्कार के बाद उन्हें संप्रदाय की परंपरा से जोड़ा जाता है।

आचार्य बाड़ा संप्रदाय शरणागति के छह सिद्धान्तों पर आधारित है जो निम्नलिखित है –

अनुकूलता का संकल्प प्रतिकूलता का वर्जन भगवान रक्षा करेंगे का दृढ़ विश्वास सब कुछ भगवान आत्मान्छिेद कार्यपन्णता
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है आचार्य बाड़ा विशिष्ट द्वैत वाद का उत्कृष्ट उदाहरण है तथा यह सम्प्रदाय अपने और ईश्वर को अलग मान अपने इष्ट की आराधना करता है।

प्रयागवाल
इतिहास में प्रसिद्ध तीर्थराज प्रयागराज की प्राचीनता के साथ-साथ प्रयागवालों का भी निकट का सम्बन्ध है। प्रयागराज के अति प्राचीन निवासी होने के कारण इनका नाम प्रयागवाल पड़ा। कुम्भ मेला व माघ मेला में आने वाले तीर्थयात्री प्रयागवाल द्वारा बसाये जाते रहे हैं और वे ही इनका धार्मिक कार्य करते हैं, जिसका विषद् वर्णन मत्स्य पुराण तथा प्रयाग महात्म्य में है। प्रयागराज में आने वाले प्रत्येक तीर्थयात्री का एक विशेष तीर्थ पुरोहित होता है। तीर्थयात्री और पुरोहित का सम्बन्ध गुरु-शिष्य परम्परा का द्योतक है। तीर्थयात्री के धार्मिक गुरु रूप माने जाने वाले इन प्रयागवालों को ही त्रिवेणी क्षेत्र में दान लेने का एक मात्र अधिकार है। जिला गजेटियर में मि० नेमिल ने लिखा है-

जो यात्री प्रयाग में आता है, उसका समस्त प्रकार का धार्मिक कर्मकाण्ड प्रयागवाल ही कराता है। सर्वप्रथम बेनीमाधव भेंट तत्पश्चात् संकल्प कराया जाता है। इसके बाद तीर्थयात्रियों का मुण्डन होता है। मुण्डन के पश्चात् स्नान और फिर पिण्ड दान, शय्यादान, गोदान व भूमिदान कराया जाता है। समस्त प्रकार के दान-उपदान प्रयागवाल द्वारा ही कराये जाते हैं। यात्रियों के परिवार की वंशावली उनसे सम्बन्धित तीर्थ पुरोहित की बही में मिलता है। प्रयागवालों के यजमान क्षेत्र व स्नान दान के आधार पर चलते हैं और यह अपने यजमानों की वंशावली सुरक्षित रखते हैं। तीर्थ पुरोहित अपने क्षेत्र के यजमानों की वंशावली तत्काल खोज लेते हैं। यजमान उनकी मोटी बहियों में अपने पूर्वजों के नाम, हस्ताक्षर आदि देखकर प्रसन्न होते हैं। प्रयागवाल शासन से मामूली शुल्क पर भूमि प्राप्त करता है, उस पर टेन्ट या कुटिया की व्यवस्था करता है। इसमें अपने तीर्थयात्रियों को ठहराता है और इससे दान स्वरूप जो लेता है, उसी से अपनी जीविका का निर्वाह करता है।

प्रयागवालों का संगठन प्रयागवाल सभा के नाम से जाना जाता है। यजमानों को टिकाने के लिए भूमि तथा संगम के निकट प्रयागवाल हेतु भूमि का आवंटन प्रयागवाल सभा के माध्यम से होता है। प्रयागवाल तख्तों की संख्या निश्चित है। प्रयागवाल अपने तख्त पर बहियों का बड़ा सा बक्सा रखते हैं तथा इन्हीं तख्तों पर आने वाले श्रद्धालुओं द्वारा धार्मिक अनुष्ठान एवं कर्मकाण्ड कराये जाते हैं। प्रयागवाल पहचान के लिए एक ऊँचे बाँस पर अपना निशान या झंडा लगाते हैं। तीर्थयात्री इसी झंडे को देखकर अपने प्रयागवाल के पास पहुँचते हैं।

आकर्षण बिन्दु

गंगा, यमुना व सरस्वती नदियों के संगम और स्वार्गिक अमृत से पवित्र भू-भाग प्रयागराज लोकप्रिय कुम्भ मेला के चार स्थानों में से एक है। उत्तर प्रदेश का यह शहर जो कुम्भ मेला- 2019 का आयोजन करेगा इन हिन्दू तीर्थयात्रियों और इतिहास के उत्साही अध्येताओं के लिए एक खजाना है जो प्राचीन मंदिरों, स्मारको तथा अनेक पर्यटक स्थलो का भ्रमण करके आनन्दित हो सकते हैं। त्रिवेणी संगम जिसका शहर के दर्शनीय स्थलों में प्रथम स्थान सुरक्षित है, के अतिरिक्त प्रयागराज के पर्यटन आकर्षण हनुमान मंदिर, मनकामेश्वर, ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण अशोक स्तम्भ और उपनिवेशिक काल का स्वराज भवन जैसे अनेक भवनों को कुम्भ मेला के दर्शन के समय कैमरे में कैद करना अपेक्षित है।

कुम्भ 2019 के मुख्य आकर्षण

पेशवाई (प्रवेशाई)
कुम्भ के आयोजनों में पेशवाई का महत्वपूर्ण स्थान है। ‘‘पेशवाई’’ प्रवेशाई का देशज शब्द है जिसका अर्थ है शोभायात्रा जो विश्व भर से आने वाले लोगों का स्वागत कर कुम्भ मेले के आयोजन को सूचित करने के निमित्त निकाली जाती है। पेशवाई में साधु-सन्त अपनी टोलियों के साथ बड़े धूम-धाम से प्रदर्शन करते हुए कुम्भ में पहुँचते हैं। हाथी, घोड़ों, बग्घी, बैण्ड आदि के साथ निकलने वाली पेशवाई के स्वागत एवं दर्शन हेतु पेशवाई मार्ग के दोनों ओर भारी संख्या में श्रद्धालु एवं सेवादार खडे़ रहते हैं जो शोभायात्रा के ऊपर पुष्प वर्षा एवं नियत स्थलों पर माल्यापर्ण कर अखाड़ों का स्वागत करते हैं। अखाड़ों की पेशवाई एवं उनके स्वागत व दर्शन को खड़ी अपार भीड़ पूरे माहौल को रोमांच से भर देती है।

पेशवाई का मार्ग, तिथि, समय एवं दल में सदस्यों की अनुमानित संख्या पूर्व निर्धारित होती है, जिससे मेला प्रशासन एवं अन्य सेवा दल आवश्यक व्यवस्थाओं को सुनिश्चित कर सके।

सांस्कृतिक संयोजन
उत्तर प्रदेश राज्य सरकार एवं भारत सरकार ने भारत की समृद्ध व विभिधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत का निदर्शन कराने हेतु सभी राज्यों के संस्कृति विभागों को गतिशील किया है। कुंभ मेला, 2019 में पांच विशाल सांस्कृतिक पंडाल स्थापित किये जायेंगे। जिनमें जनवरी, 2019 में एवं आगे दैनिक आधार पर सांगीतिक प्रस्तुति से लेकर पारंपरिक एवं लोक नृत्य के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की एक श्रृंखला आयोजित की जायेगी। पंडालों के वर्गीकरण में गंगा पंडाल सभी पण्डालों से अधिक वृहदाकार होगा जिसमें सभी बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जा सकेंगा। प्रवचन पण्डाल और 4 सम्मेलन केन्द्र जो उच्चतम गुणवत्ता की सुविधायें यथा मंच, प्रकाश और ध्वनि प्रसारण तंत्र के साथ आयोजन हेतु स्थापित किये जाने हैं जिसमें अखाड़ों की सहायता से विभिन्न आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा सकेगा। संस्कृतिक कार्यक्रमों एवं प्रस्तुतियों की समय सारिणी व कैलेण्डर हेतु इस वेबस्पेस पर नजर रखें।

नए और आकर्षक टूरिस्ट वॉक
उत्तर प्रदेश सरकार अपने वर्तमान सुनियोजित पर्यटक भ्रमण पथों में नवसुधार करेगी तथा प्रयागराज आने वाले सम्भावित पर्यटकों के लिए नवीन पथ भी आरम्भ करेगी। टूर आपरेटरो द्वारा प्रदत्त सेवा की गुणवत्ता में उन्नयन हेतु पर्यटन विभाग द्वारा संवेदनशीलता तथा विकास विषयक कार्यशालायें आयोजित की जायेगी।

पर्यटक-भ्रमण-पथों का विवरण प्रयागराज पर्यटन की बेवसाइट पर उपलब्ध होगी। इन पथो का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है :

यात्रा का आरंभ बिन्दु: शंकर विमान मण्डपम।

पहला पड़ाव: बड़े हनुमान जी का मंदिर।

दूसरा पड़ाव: पतालपुरी मंदिर।

तीसरा पड़ाव: अक्षयवट।

चौथा पड़ाव: इलाहाबाद फोर्ट।

भ्रमण का अंतिम बिन्दु: रामघाट (भ्रमण रामघाट पर समाप्त होगा)

जलमार्ग
जल परिवहन प्राचीन काल से नदियों, झीलों व समुद्र के माध्यम से मानव सभ्यता की सेवा करता आ रहा है। जल पर्यटन सदैव समस्त पर्यटन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और सदैव अन्य की अपेक्षा इसके विकास को वरीयता दी गयी है। कुम्भ 2019 के पावन पर्व पर भारतीय अंतर्देशीय जल मार्ग प्राधिकरण यमुना नदी पर संगम घाट के निकट फेरी सेवाओं का संचालन कर रहा है। इस सेवा के लिए जल मार्ग सुजावन घाट से शुरू होकर रेल सेतु (नैनी की ओर) के नीचे से वोट क्लब घाट व सरस्वती घाट से होता हुआ किला घाट में समाप्त होगा। इस 20 किमी0 लम्बे जल मार्ग पर अनेक टर्मिनल बनाये जायेंगे और बेहतर तीर्थयात्री अनुभवों के लिए मेला प्राधिकरण नौकायें व बोट उपलब्ध करायेगा।

लेजर लाइट शो
कुम्भ मेला-2019 में भारी संख्या में आने वाले तीर्थयात्रियों, धार्मिक गुरूओं तथा राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटको के अनुभवों को बेहतर बनाने की चेष्टा में उत्तर प्रदेश सरकार लेजर प्रकाश एवं ध्वनि प्रदर्शन हेतु प्रावधान कर रही है, यह प्रदर्शन किले की दीवार पर दिसम्बर 2018 से संचालित किया जायेगा।

लेजर प्रकाश एवं ध्वनि प्रदर्शन के समय सारणी हेतु इस वेब स्पेस पर नजर रखें।

परिचायक प्रवेशद्वार
इतिहास में पहली बार कुम्भ मेला-2019 बीस से अधिक परिचायक अस्थायी प्रवेशद्वारों का साक्षी होगा जो कि मेला प्रांगण की ओर जा रहे मार्गों को तथा मेले के विभिन्न सेक्टरों को चिन्हित करेंगे। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यह अभिनव उपाय कुम्भ मेले के सौदर्यात्मक महत्व को बढ़ाने हेतु इन अस्थायी परिचायक प्रवेशद्वारों की डिजाइन तैयार कर रचना की गयी है जो कि रणनीतिक दृष्टिकोण से स्थापित किये जायेगे। प्रत्येक प्रवेशद्वार की स्थानीय संदर्भो से जुड़ी सामाजिक धार्मिक कारको, संस्कृति एवं परंपरा, स्थानीय निर्माण पद्धतियों एवं सबसे महत्वपूर्ण व्यवहारिकता और पुनर्प्रयोज्यता प्रेरित अपनी पहचान होगी।

प्रयागराज कुम्भ 2019 में विशेष स्नान दिवस
कुंभ मेला हिन्दू तीर्थयात्राओं में सर्वाधिक पावन तीर्थयात्रा है। प्रयागराज कुंभ में अनेक कर्मकाण्ड सम्मिलित हैं और स्नान कर्म कुंभ के कर्मकाण्डों में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। करोड़ों तीर्थयात्री और आगंतुक दर्शकगण कुंभ मेला स्नान कर्म में प्रतिभाग करते हैं। त्रिवेणी संगम पर पवित्र डुबकी लगायी जाती है। पवित्र कुंभ स्नानकर्म इस विश्वास के अनुसरण में किया जाता है कि त्रिवेणी संगम के पवित्र जल में डुबकी लगाकर एक व्यक्ति अपने समस्त पापों को धो डालता है, स्वयं को और अपने पूर्वजों को पुनर्जन्म के चक्र से अवमुक्त कर देता है और मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। स्नान - कर्मकाण्ड के साथ-साथ तीर्थयात्री पवित्र नदी के तटों पर पूजा भी करते हैं और विभिन्न साधुगण के साथ सत्संग में प्रतिभाग करते हैं।

मकर संक्रांति (माघ मास का प्रथम दिन, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है) से आरंभ होकर प्रयागराज कुंभ के प्रत्येक दिन इस कर्मकाण्ड का सम्पादन एक पवित्र स्नान माना जाता है, तथापि कतिपय मांगलिक पवित्र स्नान तिथियां और भी हैं। कुंभ मेला के आरंभ से विहित तिथियों पर शाही स्नान जिसे ‘राजयोगी स्नान’ के रूप में भी जाना जाता है, वहां विभिन्न अखाड़ों (धार्मिक आदेशपीठों) के सदस्यों, संतों एवं उनके शिष्यों की आकर्षक शोभायात्रायें निकाली जाती हैं। शाही स्नान कुंभ मेला का प्रमुख स्नान है एवं कुम्भ मेला का केन्द्रीय आकर्षण हैं और महोत्सव का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है, केवल शाही स्नान के पश्चात् ही सर्व साधारण को इस विश्वास में पवित्र स्नान करना अनुज्ञात किया जाता है, कि जन सामान्य भी पवित्र संतों के पवित्र कार्यों एवं विचारों के सार कलाप प्राप्त कर सकेंगे।

मकर संक्रान्ति
एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य के संक्रमण को ही संक्रान्ति कहते हैं । भारतीय ज्योतिष के अनुसार बारह राशियां मानी गयी हैं- मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन, जनवरी महीने में प्रायः 14 तारीख को जब सूर्य धनु राशि से (दक्षिणायन) मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायण होता है तो मकरसंक्रांति मनायी जाती है । लोग व्रत स्नान के बाद अपनी क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ दान अवश्य करते हैं।
15 जनवरी, 2019संगम, प्रयागराजपूर्ण दिवस
पौष पूर्णिमा
भारतीय पंचांग के पौष मास के शुक्ल पक्ष की 15वीं तिथि को पौष पूर्णिमा कहते हैं। पूर्णिमा को ही पूर्ण चन्द्र निकलता है। कुम्भ मेला की अनौपचारिक शुरूआत इसी दिवस से चिन्हित की जाती है। इसी दिवस से कल्पवास का आरम्भ भी इंगित होता है।
21 जनवरी, 2019संगम, प्रयागराजपूर्ण दिवस

मौनी अमावस्या
यह व्यापक मान्यता है कि इस दिन ग्रहों की स्थिति पवित्र नदी में स्नान के लिए सर्वाधिक अनुकूल होती है। इसी दिन प्रथम तीर्थांकर ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और यहीं संगम के पवित्र जल में स्नान किया था। इस दिवस पर मेला क्षेत्र में सबसे अधिक भीड़ होती है।
4 फरवरी, 2019संगम, प्रयागराजपूर्ण दिवस

बसंत पंचमी
हिन्दू मिथकां के अनुसार विद्या की देवी सरस्वती के अवतरण का यह दिवस ऋतु परिवर्तन का संकेत भी है। कल्पवासी बसंत पंचमी के महत्व को चिन्हित करने के लिए पीत वस्त्र धारण करते हैं।
10 फरवरी, 2019संगम, प्रयागराजपूर्ण दिवस

माघी पूर्णिमा
यह दिवस गुरू बृहस्पति की पूजा और इस विश्वास कि हिन्दू देवता गंधर्व स्वर्ग से पधारे हैं, से जुड़ा है। इस दिन पवित्र घाटो पर तीर्थयात्रियों की बाढ़ इस विश्वास के साथ आ जाती है कि वे सशरीर स्वर्ग की यात्रा कर सकेगें।
19 फरवरी, 2019संगम, प्रयागराजपूर्ण दिवस

महाशिवरात्रि
यह दिवस कल्पवासियों का अन्तिम स्नान पर्व है और सीधे भगवान शंकर से जुड़ा है। और माता पार्वती से इस पर्व के सीधे जुड़ाव के नाते कोई भी श्रद्धालु शिवरात्रि के व्रत ओर संगम स्नान से वंचित नहीं होना चाहता। कहते हैं कि देवलोक भी इस दिवस का इंतजार करता हैं।
4 मार्च , 2019संगम, प्रयागराजपूर्ण दिवस

कुंभ-2019 को एक अद्वितीय भव्यता का उत्सव बनाने आयोजन करने के लिये उत्तर प्रदेश सरकार ने मेला का सक्षम संचालन सुनिश्चित करते हुये अनेक उपाय किये हैं। अभूतपूर्व दीर्घास्थाई निर्माण कार्य किये जा रहे हैं। फ्लाईओवरों और रेलवे अधोसेतुओं के निर्माण, शहर में 34 सड़कों का चौड़ीकरण और 32 मुख्य चौराहों का सौन्दर्यीकरण का व्रह्द्द निर्माण एवं उन्नयन कार्य प्रयागराज को कुंभ- 2019 के लिये तैयार करने हेतु कराये जा रहे कार्यों की कुछ प्रमुख झलकियाँ हैं।

सरकार के सभी विभागों के द्वारा विकास कार्य किये जा रहे हैं। इन कार्यां में रेलवे स्टेशनों का उन्नयन और सम्पूर्ण विश्व से आने वाले दर्शकों एवं तीर्थयात्रियों के आवागमन हेतु प्रयागराज में नवीन सिविल एयरपोर्ट का निर्माण प्रगति पर है। अग्रेतर, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण प्रयागराज को प्रतापगढ़, रायबरेली एवं वाराणसी से सम्बद्ध करने वाले प्रमुख राजमार्गों का पुनर्निर्माण एवं उन्नयन कर रहा है। तीर्थयात्रियों को एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक नौ वहन की सुविधा स्नान घाटों तक पहुंचने के लिये भारतीय नौ अंतर्देशीय वहन प्राधिकरण द्वारा 5 जेटीज का निर्माण कर उपलब्ध कराई जायेगी।

116 सड़कों का निर्माण एवं चौड़ीकरण कार्य लोक निर्माण विभाग द्वारा किया जा रहा है। लगभग 3200 हेक्टेयर क्षेत्र में 84 पार्किंग स्थलों का निर्माण संगम से अल्प दूरी पर किया जा रहा है। 524 से अधिक शटल बसें एवं बहुसंख्या में सी0एन0जी0 आटो यात्रीगण को आने ले जाने के लिये चलाये जाने हैं। अब तक 41 पार्किंग स्थलों की पहचान कर ली गयी है, जिसमें से 18 को परिकस्बों के रूप में विकसित किया गया है। लगभग 54 ठहराव क्षेत्रों का विकास शहर में विभिन्न स्थानों पर किया जा रहा है जिसका उपयोग शहर में यात्रियों के द्वारा प्रतीक्षा व विश्राम हेतु किया जायेगा।

व्यवस्थित एवं सहज यातायात हेतु मेला क्षेत्र, शहर एवं आवागमन के क्षेत्रों में डिजिटल संकेतन की व्यवस्था किये जाने की योजना बनायी गयी है। स्वच्छता एवं स्वास्थ्यप्रद सफाई बनाये रखने हेतु 1.22 लाख से अधिक शौचालयों को स्थापित किये जाने की योजना है और सेप्टिक प्रबंधनों हेतु आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। कचरा एकत्र करने हेतु कुल 20000 डस्टबिन लगाये जायेंगे और कचरे के मेला क्षेत्र से बाहर परिवहन हेतु 120 टिप्पर्स एवं 40 कॉम्पैक्टर्स लगाये जायेंगे।

दिव्य कुंभ-भव्य कुंभ का वास्तविक अनुभव कराने के लिये मेला क्षेत्र को 40 हजार से अधिक एल0ई0डी0 बल्बों से प्रकाशित किया जायेगा। पर्यटकों की सुविधा हेतु पी0पी0पी0 माडल पर 4200 प्रीमियम टेंटों का एक शहर स्थापित किया जा रहा है, जो सांस्कृतिक कार्यक्रमों का केन्द्र होगा। तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिय प्रत्येक सेक्टर में पंड़ाल स्थापित किये जायेंगे। वृहद पैमाने पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करने के लिये गंगा पंडाल स्थापित किया जा रहा है। मेला क्षेत्र में सभागारों का निर्माण किया जा रहा है। कुंभ मेला के नवोन्मेषी नूतन आकर्षणों में परिचायक प्रवेशद्वार, लेजर शो, ‘पेंट माई सिटी’ अभियान और हेलीटूरिज्म हैं।

कुंभ- 2019 की यातायात व्यवस्था तीर्थयात्रियों की सुविधाओं में वृद्धि करने हेतु नियोजित की गयी है। आगुंतको को सुविधा प्रदान करने के लिये दूरसंचार सेवायें, बैंकिंग सेवायें और वाटर ए0टी0एम0 सम्पूर्ण मेला क्षेत्र में नियोजित किये जा रहे हैं। यात्रियों की सुरक्षा का प्रबंध करने के लिये समेकित समादेश एवं नियंत्रण केन्द्र जो आधुनिक तकनीक से सज्जित हैं, नियोजित किये जा रहे हैं। सम्पूर्ण मेला क्षेत्र में बेहतर निगरानी और जोखिमों, जिससे भारी आपदा हो सकती है, में कमी लाये जाने हेतु 1000 सी0सी0टी0वी0 कैमरे स्थापित किये जायेंगे।

कुंभ मेला में शिविर प्रबंधन
पर्यटकों हेतु 4,200 प्रिमियम टेंट्स निर्मित किये जायेंगे और पी0पी0पी0 आधार पर संचालित किये जायेंगे कुल 20,000 बिस्तरों की क्षमता के साथ जन परिसर, 10ए000 लोगों को अंतर्विष्ट करने की एक क्षमता के साथ गंगा पंडाल निर्मित किया जायेगा जिसका उपयोग सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं शासकीय कार्यक्रमों के लिये किया जायेगा जो कलात्मक सुविधाओं से सम्पन्न होगाप्रत्येक प्रभाग के लिये आधुनिक एवं सामयिक साज-सज्जा युक्त 4 सभागार। मेला क्षेत्र में धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों के आयोजन हेतु 2000 लोगो की क्षमता का प्रवचन सभागार का निर्माण किया जायेगा

सफाई
1,22,000 से अधिक शौचालय 20,000 से अधिक डस्टबिन आंतरिक बैग के साथ 1,000 से अधिक सफाई कर्मी कचरा निस्तारण हेतु 40 कॉम्पैक्टर्स एवं 120 टिप्पर्स पैदल सेना के रूप में 2000 से अधिक गंगा प्रहरी/स्वच्छाग्रही।

यातायात योजना
मेला क्षेत्र में 300 कि०मी० सड़क। 22 पण्टून पुलों के निर्माण हेतु 1795 पांटूनों का उपयोग किया जायेगा। 84 से अधिक पार्किंग स्थल। मेला अवधि के दौरान भीड़ नियंत्रण हेतु 54 ठहराव क्षेत्र। 524 शटल बसेज एवं हजारों सी०एन०जी० आटो नियोजित किये जायेंगे। 2000 से अधिक डिजिटल पथ प्रदर्शक बोर्ड।

विद्धुत व्यवस्था
40,700 एल०ई०डी० लाइट्स 1030 कि०मी० एल०टी० लाइन 105 कि0मी० हाइपर टेंशन लाइन 175 हाई मास्ट्स 54 अस्थायी उपकेन्द्र 2,80,000 शिविरों में विद्युत कनेक्शन

नालियाँ एवं नाले
150 कि0मी0 एच०डी०पी०ई० पाइप लाइन850 कि०मी० नालियां ट्राली पर लगे हुये 100 पम्प

पेयजल
5000 स्टैण्ड पोस्ट 800 कि०मी० पाइप लाइन 200 वाटर ए०टी०एम० 150 वाटर टैंकर्स 100 हैण्ड पम्प्स

विक्रय क्षेत्र
भोजन स्टालों, परचून की दूकानों, कपड़े एवं बर्तन की दूकानों हेतु भाव-आधारित विक्रय क्षेत्र
विक्रेतागण की पहिचान एवं आनलाइन पंजीकरण को सुनिश्चित करने के लिये दूकान आवंटन का आनलाइन तंत्र

सौन्दर्यीकरण
महत्वपूर्ण सड़कों का सौंदर्यीकरणगमलों सहित 2 लाख पौधों रोपणभाव-प्रवण द्वार, झंडे एक सेल्फी बिन्दुप्रयागराज सिटी से 10 कि०मी० की रैडियस के भीतर बड़ी संख्या में सम्पर्क मार्गों का सौंदर्यीकरणमहत्वपूर्ण शासकीय भवनों एवं अन्य बड़ी-निजी इमारतों का अवसंरचनात्मक विकास एवं प्रकाश व्यवस्था

पुलिस योजना
4 पुलिस लाइन 40 पुलिस थाने 3 महिला पुलिस थाना 62 पुलिस चैकियां 40 अग्निशमन केन्द्र40 निगरानी टावर 1000 से अधिक सी०सी०टी०वी० कैमरा

सिविल आपूर्तियां
10 लाख से अधिक कल्पवासियों तक नागरिक आपूर्तियां पहुंचाने के लिये राशनकार्ड अखाड़ों एवं धार्मिक संगठनों के लिये नागरिक आपूर्तियां पहुंचाने हेतु अनुज्ञापत्र

अन्य प्रमुख विशिष्टियां
9 रेलवे स्टेशनों का उच्चीकरण 9 आर०ओ०बी० का विकास 6 आर०यू०बी का विस्तार प्रयागराज सिविल एयरपोर्ट पर एक नवीन टर्मिनल का निर्माण किया जा रहा है एन०एच०ए०आई० निम्न सड़कों का पुनर्निमाण एवं उच्चीकरण कार्य कर रही है
प्रयागराज - प्रतापगढ़ राजमार्ग रायबरेली - प्रयागराज राजमार्ग वाराणसी - प्रयागराज राजमार्ग भारतीय अंतर्देशीय जल मार्ग प्राधिकरण 5 स्थानों पर जेटीज का निर्माण कर रही है

क्या करें एवं क्या न करें

क्या करें
कृपया संचलन योजना, आवासीय परिसर, महत्वपूर्ण अवसरों एवं तिथियां इत्यादि के लिये बेबसाइट पर देखें और मोबाइल ऐप डाउनलोड करें।

हल्के सामान के साथ यात्रा करें। यदि डाक्टर के द्वारा सलाह दी गयी है तो दवायें साथ लायें। अस्पताल, खाद्य एवं आकस्मिक सेवायें इत्यादि सुविधाओं की जानकारी रखें। आकस्मिक सम्पर्क नंबर की जानकारी रखें। केवल उन्ही स्नान क्षेत्रों/घाटों का उपयोग करें जो मेला द्वारा प्राधिकृत किये गये हैं। उपलब्ध शौचालयों एवं मूत्रालयों का उपयोग करें। कचरा निस्तारण हेतु डस्टबिन का उपयोग करें। मार्ग खोजने के लिये पथ प्रदर्शक बोर्ड का उपयोग करें। वाहनों को खड़ा करने के लिये पार्किंग स्थलों का उपयोग करें और यातायात नियमों का पालन करें। मेला क्षेत्र व शहर में रूकने के लिये स्थान के निकटतम स्नान घाटों का उपयोग करें। यदि कोई अपरिचित या संदिग्ध वस्तु पायी जाती है तो पुलिस या मेला प्रशासन को सूचित करें। जन संचारण तंत्र या किसी अन्य विधा के माध्यम से दिये गये नियमों, विनियमों एवं अनुदेशों का अनुसरण करें। मेला आयोजन में कार्यकारी विभागों के साथ सहयोग करें। अपने सामानों के प्रति सजग रहें और अपने प्रिय जनों एवं सामन के खोने की स्थिति में खोया पाया केन्द्र पर संपर्क करे। कोई यात्रा योजना बनाते समय अतिरिक्त समय शामिल करें।

क्या न करें
मूल्यवान, अनावश्यक खाद्य पदार्थ, कपड़े एवं सामान न लायें। अजनबी पर विश्वास न करें। अप्राधिकृत स्थानों पर भोज्य ग्रहण न करें। उकसाने वाली बात करके अनावश्यक संघर्ष आमांत्रित न करें। अनुमन्य सीमाओं से परे नदी में जाने का साहस न करें। साबुन, डिटरर्जेंट का उपयोग सफाई/धुलाई के प्रयोजनार्थ करते हुये या पूजन सामग्री को फेकते हुये नदियों को प्रदूषित न करें। यदि किसी संक्रामक रोग से ग्रसित हैं तो भीड़ भरी स्थानों पर न रूके । शहर में एवं मेला क्षेत्र में प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग न करें। प्लास्टिक की थैलियां सरकार और माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा कुंभ मेला के दौरान प्रतिषिद्ध हैं। खुले में शौच या मूत्र त्याग न करें।

प्रयागराज का इतिहास

प्रयागराज
"प्रमाणिक इतिहास के आरंभ के काफी पूर्व से प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) में जैसा कि यह आज है, का भू-भाग सभ्य प्रजातियों के प्रभाव में रहा है जब कि प्रागैतिहासिक काल में इसके सत्र सामायिक स्थान आज समाप्त हो गये हैं, प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्र का प्रयाग आज भी महाभारत काल के इन्द्रप्रस्थ की तरह विद्यमान है जहां यह 5000 वर्षों पूर्व था "। (माडर्न ई०पू० 1910)

600 ईशा पूर्व में वर्तमान प्रयागराज जिला के भागों को आवृत्त करता हुआ एक राज्य था। इसे "कौशाम्बी" में राजधानी के साथ "वत्स" कहा जाता था। जिसके अवशेष आज भी प्रयागराज के पश्चिम में स्थित है। गौतम बुद्ध ने अपनी तीन यात्रायें करके इस शहर को गौरव प्रदान किया। इस क्षेत्र के मौर्य साम्राज्य के अधीन आने के पश्चात् कौशाम्बी को अशोक के प्रांतों में से एक का मुख्यालय बनाया गया था। उसके अनुदेशों के अधीन दो अखण्ड स्तम्भों का निर्माण कौशाम्बी में किया गया था। जिनमें से एक बाद में प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) स्थानांतरित कर दिया गया था।

मौर्य साम्राज्य की पुरातन वस्तुएं एवं अवशेषों की खुदायी, जिले के एक अन्य महत्वपूर्ण स्थान भीटा से की गयी है। मौर्य के पश्चात् शुंगों ने वत्स या प्रयागराज क्षेत्र पर राज्य किया। यह प्रयागराज जिले में पायी गयी शुंगकालीन कलात्मक वस्तुओं से आभासित होता है। शुंगो के पश्चात् कुषाण सत्ता में आये- कनिष्क की एक मुहर और एक अद्वितीय मूर्ति लेखन कौशाम्बी में पायी गयी है जो उसके राज्य के द्वितीय वर्ष के दौरान की है। कौशाम्बी, भीटा एवं झूंसी में गुप्त काल की वस्तुयें भी पायी गयी हैं। अशोक स्तम्भ के निकाय पर समुद्रगुप्त की प्रशस्ति की पंक्तियां खुदी हुई हैं जब कि झूंसी में वहां उसके पश्चात् नामित समुद्र कूप विद्यमान है। गुप्तों के पराभव पर प्रयागराज का भविष्य विस्मृत हो गया। हृवेनसांग ने 7वी शताब्दी में प्रयागराज की यात्रा किया और प्रयाग को मूर्तिपूजकों का एक महान शहर के रूप में वर्णित किया जिसका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मणवाद की महत्ता उनकी यात्रा के समय तक स्थापित रही है।

1540 में शेरशाह हिन्दुस्तान का शासक हो गया, यह इसी समय था कि पुरानी ग्रांड ट्रंक रोड आगरा से कारा तक बनायी गयी थी और तब पूर्व में प्रयागराज, झूंसी और जौनपुर तक बनायी गयी थी। 1557 में झूंसी एवं प्रयाग के अधीन ग्राम मरकनवल में जौनपुर के विद्रोही गवर्नर और अकबर के मध्य एक युद्ध लड़ा गया था। विजय के उपरांत अकबर एक दिन में ही प्रयाग आया और वाराणसी जाने के पूर्व दो दिनों तक यहां विश्राम किया, यह तभी था कि उसने इस रणनीतिक स्थान पर एक किला के महत्व का अनुभव किया।

अकबर वर्ष 1575 में पुनः प्रयाग आया और एक शाही शहर की आधारशिला रखा। जिसे उसने इलाहाबास कहा। अकबर के शासन के अधीन नवीन शहर तीर्थयात्रा का अपेक्षित स्थान हो गया। शहर के महत्व में तीव्र विकास हुआ और अकबर का शासन की समाप्ति के पूर्व इसके आकार और महत्व में पर्याप्त वृद्धि हुई।

दर्शनीय स्थल

शंकर विमान मण्डपम
श्री वेणी माधव
संकटमोचन हनुमान मंदिर
मनकामेश्वर मंदिर
भारद्वाज आश्रम
विक्टोरिया स्मारक
प्रयाग संगीत समिति
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
पब्लिक लाइब्रेरी
गंगा गैलरी
श्री अखिलेश्वर महादेव
दशाश्वमेघ मंदिर
तक्षकेश्वर नाथ मंदिर

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